नेपाल में चीन का विस्तारवाद, हथियाई जमीन

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Updated on: Aug 27, 2020 | 9:05 AM

नेपाल और चीन ​के बीच टकराव का मुद्दा रहे सीमा के कई स्तम्भ गायब चार जिलों में नदियों के किनारे की जमीन चीन ने अपनी सीमा में मिलाई ​सीमावर्ती जिलों में कई स्थानों की 64 हेक्टेयर भूमि पर किया अतिक्रमण नेपाल को चीन से ‘दोस्ती’ की बड़ी कीमत चुकी पड़ रही है लेकिन नेपाली प्रधान […]

नेपाल में चीन का विस्तारवाद, हथियाई जमीन
  • नेपाल और चीन ​के बीच टकराव का मुद्दा रहे सीमा के कई स्तम्भ गायब
  • चार जिलों में नदियों के किनारे की जमीन चीन ने अपनी सीमा में मिलाई
  • ​सीमावर्ती जिलों में कई स्थानों की 64 हेक्टेयर भूमि पर किया अतिक्रमण

नेपाल को चीन से ‘दोस्ती’ की बड़ी कीमत चुकी पड़ रही है लेकिन नेपाली प्रधान मंत्री केपी शर्मा ओली के मौन समर्थन से नेपाली भूमि पर चीन का अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है. अब तक चीन ने नेपाल के सात ​​सीमावर्ती जिलों में कई स्थानों पर जमीन हथिया ली है. सरकार की चुप्पी का नतीजा है कि नेपाल में चीन का ‘विस्तारवाद’ बढ़ता जा रहा है और देश की ओली सरकार इस मुद्दे पर आंखें मूंदे है.

नेपाल के कृषि मंत्रालय के सर्वेक्षण विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि नेपाल के जिन जिलों की जमीन चीन हड़प रहा है, उनमें दोलखा, गोरखा, दार्चुला, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुवासभा और रसुवा शामिल हैं. नेपाल के सर्वेक्षण और मानचित्रण विभाग के अनुसार चीन ने अंतरराष्ट्रीय सीमा 1,500 मीटर को दोलखा में नेपाल की ओर धकेल दिया है. चीन ने दोलखा में कोरलंग क्षेत्र में सीमा स्तंभ संख्या 57 को पीछे खिसका दिया है, जो पहले कोलांग के शीर्ष पर स्थित था. यह स्तंभ दोनों देशों ​​के बीच टकराव का मुद्दा रहा है. चीन ने नेपाली सरकार पर दबाव डाला कि दोनों देशों के बीच सीमा विवादों को हल करने के लिए चौथे प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर न करें, क्योंकि चीन यथास्थिति बनाए रखना चाहता था और सीमा व्यवस्था को और आगे बढ़ाता था.

सर्वेक्षण और मानचित्रण विभाग के मुताबिक चीन ने गोरखा और दार्चुला जिलों में नेपाली गांवों पर कब्जा कर लिया है. दोलखा की ही तरह चीन ने गोरखा जिले में सीमा स्तंभ संख्या 35, 37 और 38 और सोलुखुम्बु में नम्पा भंज्यांग में सीमा स्तंभ संख्या 62 को स्थानांतरित कर दिया है. पहले गोरखा के रुई गांव और टॉम नदी के क्षेत्रों में तीन स्तंभ स्थित थे. हालांकि नेपाल का आधिकारिक मानचित्र अभी भी इस गांव को नेपाली क्षेत्र के हिस्से के रूप में दिखाता है जबकि चीन ने 2017 में इस क्षेत्र पर कब्जा करके इसे तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ मिला दिया था.

इसी तरह मानवाधिकार आयोग ने बताया है कि दार्चुला के जिउजीऊ गांव के एक हिस्से पर भी चीन ने कब्जा कर लिया है. कभी नेपाल का हिस्सा रहे कई घरों को अब चीन ने उन्हें अपने कब्जे में लेकर अपने क्षेत्र में मिला लिया है. दो नेपाली एजेंसियों के अलावा कृषि मंत्रालय ने भी हाल ही में एक रिपोर्ट के साथ चीन द्वारा भूमि कब्जाने के कई मामलों को उजागर किया है. मंत्रालय ने चार नेपाली जिलों के अंतर्गत आने वाले कम से कम 11 स्थानों पर चीन के नेपाली भूमि पर कब्जे के बारे में सूचना दी है. इन जिलों के अधिकांश क्षेत्र नदियों के किनारे हैं, जिनमें हुमला, कर्णली नदी, संजेन नदी, रसुवा में लेमडे नदी, भृगु नदी, खारेन नदी, सिंधुपालचौक, भोटेकोशी नदी और संखुवासभा में समजुग नदी, कामाखोला नदी और अरुण नदी है.

चीन के इस जमीन हड़पने की हरकत के विरोध में जून में विपक्षी नेपाली कांग्रेस के सदस्यों ने नेपाली संसद के निचले सदन में एक प्रस्ताव रखा. प्रतिनिधियों ने ओली सरकार से देश की जमीन को चीन से मुक्त कराने के लिए कहा. नेपाली कांग्रेस के सांसदों ने आरोप लगाया कि चीन ने देश के दोलखा, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुवासभा, गोरखा और रसुवा जिलों में 64 हेक्टेयर भूमि का अतिक्रमण किया. इनका कहना है कि नेपाल और चीन के बीच 1414.88 किलोमीटर लंबी सीमा के साथ कुल 98 सीमा स्तंभों में से कुछ गायब हो गए हैं. नेपाल में चीनी राजदूत ने एनसीपी के ओली और प्रचंड गुटों के बीच सुलह कराने और ओली सरकार को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. यही वजह है कि चीन लगातार ‘दोस्ती’ की दुहाई देकर नेपाल में घुसपैठ करने और नेपाली क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए अपना रास्ता साफ़ करता जा रहा है.

हिन्दुस्थान समाचार/सुनीत

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